Saturday, 1 August 2020

क्या नई शिक्षा नीति से शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन आएंगे?

(हमारे प्राचीन शैक्षिणिक इतिहास, उपलब्धियों, गलतफहमी का जायजा लेने और 21 वीं सदी के भारत के लिए भविष्य की शिक्षा योजना का चार्ट सही समय परआया है। पेशेवर योग्य शिक्षकों की कमी और गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती में वृद्धि ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को त्रस्त कर दिया है।)
  
---प्रियंका सौरभ   
भारत में ज्ञान प्रदान करने की एक अति समृद्ध परंपरा रही है। 'गुरुकुल' प्राचीन भारत में एक प्रकार की शिक्षा प्रणाली थी जिसमें एक ही घर में गुरु के साथ रहने वाले शिष्य (छात्र) थे। नालंदा इस  दुनिया में शिक्षा का सबसे पुराना विश्वविद्यालय-तंत्र था। दुनिया भर के छात्र भारतीय ज्ञान प्रणालियों से आकर्षित और अचंभित थे। आधुनिक ज्ञान प्रणाली की कई शाखाओं की उत्पत्ति भारत में हुई थी। प्राचीन भारत में शिक्षा को एक उच्च गुण माने जाने के पीछे हमारी प्राचीन ज्ञान परमपरा ही रही है।  हालांकि, आधुनिक भारत औपनिवेशिक शासन के वर्षों, वित्तीय बाधाओं और गलत नीतियों के कारण भारतीय शिक्षा पद्धति अपने शुरुआती बढ़त को भुनाने में विफल रही है, जिसका खमियाजा पूरे हिन्दुस्तान को पीढ़ियों तक भुगतना पड़ा है।



आज मोदी सरकार भारत में शिक्षा प्रणाली के पुनर्गठन के लिए नई शिक्षा नीति को नवाचारों के साथ लेकर आई है जो अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करके भविष्य में चौथी औद्योगिक क्रांति में भारतीय जरूरतों को पूरा करेगी। नई शिक्षा नीति का मसौदा राष्ट्रीय शिक्षा नीति  समिति डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में  31 मई, 2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर अंतिम रूप से पेश हुआ था और बजट 2019-20 में जल्द ही इस नीति को लागू करने का प्रस्ताव किया गया था। आज इस शिक्षा नीति को अगले वर्ष से पूरे देश भर में लागू कर दिया गया है।

वर्तमान शिक्षा नीति में खामियों के चलते इस नए रूप को लाने की आवश्यकता अनुभव की गई थी। वैसे भी वर्तमान पाठ्यक्रम बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। और वर्तमान शिक्षा क्षेत्र योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी से बुरी तरह संघर्ष कर रहा है। वर्तमान में, बचपन की अधिकांश शिक्षा आंगनवाड़ियों और निजी-प्ले स्कूलों के माध्यम से दी जाती है। हालांकि, इस नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक बचपन के शैक्षिक पहलुओं पर कम ध्यान दिया गया है। नीति में बचपन की देखभाल और शिक्षा के लिए दो-भाग के पाठ्यक्रम को विकसित करने की सिफारिश की गई है। तीन साल तक के बच्चों के लिए दिशानिर्देश और  तीन से आठ साल के बच्चों के लिए शैक्षिक ढांचा। जो आंगनवाड़ी प्रणाली में सुधार और विस्तार और प्राथमिक विद्यालयों के साथ आंगनवाड़ियों के सह-कार्यान्वयन द्वारा लागू किया जाएगा।

नई नीति में तीन से 18 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के दायरे में विस्तार की बात हुई है, जिसमे  प्रारंभिक बचपन की शिक्षा और माध्यमिक स्कूल शिक्षा शामिल है। सतत और व्यापक मूल्यांकन और नो-डिटेंशन पॉलिसी पर आरटीई अधिनियम में हालिया संशोधनों की समीक्षा पर जोर  दिया गया है। कक्षा आठ तक के बच्चों के लिए स्कूलों को यह सुनिश्चित करने के दिशा निर्देश दिए गए है कि बच्चे आयु-उपयुक्त सीखने के स्तर को प्राप्त कर रहे हैं या नहीं। अब नई नीति के आधार पर केवल मूल अवधारणा का परीक्षण करने के लिए बोर्ड परीक्षाओं का पुनर्गठन किया जायेगा न की टोपर ढूंढने के लिए। ये बोर्ड परीक्षा कई विषयों पर होगी। छात्र अपने विषयों और सेमेस्टर का चयन अपनी रूचि अनुसार कर सकते हैं, जिसमे वो विज्ञान के साथ कला के विषयों को पढ़ने का अवसर भी अपनी रूचि अनुसार पा सकेंगे।

छात्रों की विकास आवश्यकताओं के आधार पर स्कूली शिक्षा की वर्तमान संरचना का पुनर्गठन किया गया है। जिसमे 10 + 2 + 3 संरचना को 5-3-3-4 डिज़ाइन द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना है जिसमें शामिल हैं: (i) पांच साल का फाउंडेशनल स्टेज (पूर्व-प्राथमिक स्कूल के तीन साल और कक्षा एक और दो), (ii) तैयारी के तीन साल मंच (कक्षा तीन से पांच), (iii) तीन साल का मध्य चरण (कक्षा छह से आठ), और (iv) चार साल का माध्यमिक चरण (कक्षा नौ से 12)। वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल रट्टा सीखने पर केंद्रित है। अब पाठ्यक्रम भार को इसकी आवश्यक मूल सामग्री तक कम किये जाने के प्रयास किये गए हैं। स्कूल परीक्षा सुधार हेतु नए तरीके ढूंढें गए है, वर्तमान बोर्ड परीक्षाएं छात्रों को केवल कुछ विषयों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर करती है, जो उनके सर्वागीण विकास में बाधक है, ख़ुशी-ख़ुशी पढाई करना तो भारतीय छात्रों को आता ही नहीं। आज की पद्धत्ति में एक फार्मूलाबद्ध तरीके से सीखने का परीक्षण  छात्रों में तनाव का कारण बन गया है ।

यद्यपि हर बस्ती में प्राथमिक स्कूलों की स्थापना ने शिक्षा की पहुंच को बढ़ाया है, इसने बहुत छोटे स्कूलों के विकास को संचालित किया है लेकिन वो इसे जटिल बनाते हैं। इसलिए नई नीति में स्कूल परिसर बनाने के लिए कई पब्लिक स्कूलों को एक साथ लाया जाना चाहिए की बात की गई है। इसके लिए एक कॉम्प्लेक्स में एक माध्यमिक स्कूल (कक्षा नौ से बारह) और उसके पड़ोस के सभी पब्लिक स्कूल शामिल होंगे जो कि प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक शिक्षा प्रदान करते हैं। इनमें आंगनवाड़ियों, व्यावसायिक शिक्षा सुविधाओं और एक वयस्क शिक्षा केंद्र भी शामिल होंगे। प्रत्येक स्कूल परिसर एक अर्ध-स्वायत्त इकाई होगी जो प्रारंभिक अवस्था से लेकर माध्यमिक शिक्षा तक सभी चरणों में एकीकृत शिक्षा प्रदान करेंगे। बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित शिक्षकों जैसे संसाधनों को एक स्कूल परिसर में कुशलता से साझा करने के हर प्रयास किये जायेंगे।

पेशेवर योग्य शिक्षकों की कमी और गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती में वृद्धि ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को त्रस्त कर दिया है। इसके लिए नई नीति के अनुसार शिक्षकों की नयी भर्ती और उनको को कम से कम पांच से सात साल के लिए एक विशेष स्कूल परिसर में तैनात किया जाना चाहिए पर जोर दिया गया है। उन्हें स्कूल के घंटों के दौरान किसी भी गैर-शिक्षण गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मौजूदा बी.एड. कार्यक्रम को चार वर्षीय एकीकृत बी.एड द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा। उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री, शिक्षाशास्त्र और व्यावहारिक प्रशिक्षण और सभी विषयों के लिए एक एकीकृत सतत व्यावसायिक विकास भी किया जाएगा। नीति निर्धारण, स्कूल संचालन और शैक्षणिक विकास जैसे पहलुओं से स्कूलों के विनियमन को अलग अलग संचालित किया जायेगा। प्रत्येक राज्य के लिए स्वतंत्र राज्य स्कूल नियामक प्राधिकरण स्थापित किये जायेंगे जो सार्वजनिक और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी समान मानकों को निर्धारित करेंगे। नीति को मजबूत करने के लिए राज्य का शिक्षा विभाग नीति तैयार करेगा और निगरानी और पर्यवेक्षण करेगा।

सही में नई शिक्षा नीति में शोध,और अनुसंधान पर बल दिया गया है, तकनीकी के उपयोग, विभिन्न विषयों के बीच परस्पर सहयोग, सामंजस्य और संवाद, शिक्षकों का प्रशिक्षण , ये सभी सम्मिलित रूप से देश के शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाएंगे। शिक्षा क्षेत्र में नवीनतम कस्तूरीरंगन रिपोर्ट या नई शिक्षा नीति का मसौदा शिक्षा में सुधार के लिए समय की आवश्यकता को दर्शाता है। आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली एक सुधार के लिए रो रही है। नई शिक्षा नीति (एनईपी) का मसौदा अपने पिछले इतिहास, उपलब्धियों, गलतफहमी का जायजा लेने और 21 वीं सदी के भारत के लिए भविष्य की शिक्षा योजना का चार्ट बनाने का सही समय है।

----प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
 

 सेना में हर स्तर पर अब महिलाएं संभालेंगी कमान


(सैन्य वायु रक्षा, सिग्नल, इंजीनियर, सैन्य विमानन, इलेक्ट्रॉनिक एवं मैकेनिकल इंजीनियर, सैन्य सेवा कोर और खुफिया कोर में अब महिलाये देश का प्रतिनिधित्व करती नज़र आएगी)


-- ----प्रियंका सौरभ   
रक्षा मंत्रालय ने सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिये आदेश जारी कर दिया है. उच्चतम न्यायालय ने फरवरी में एक ऐतिहासिक निर्णय में निर्देश दिया था कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) योजना के तहत भर्ती की गईं सभी सेवारत महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर विचार किया जाए. सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा कि सरकारी आदेश से सेना में बड़ी भूमिकाओं में महिला अधिकारियों की भागीदारी का रास्ता साफ हो गया है.  भारतीय सेना के सभी 10 अंगों में शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का निर्देश देता है. सैन्य वायु रक्षा, सिग्नल, इंजीनियर, सैन्य विमानन, इलेक्ट्रॉनिक एवं मैकेनिकल इंजीनियर, सैन्य सेवा कोर और खुफिया कोर में अब महिलाये देश का प्रतिनिधित्व करती नज़र आएगी



दुनिया में आज हर क्षेत्र में महिलायें आगे बढ़ रही है और ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल कर रही हैं. भारतीय इतिहास नारी की त्याग-तपस्या की गाथाओं से भरा पड़ा है। किसी युग में महिलाएं पुरुषों से कमतर नहीं रहीं। वैदिक युग में महिलाएं युद्ध में भी भाग लेती थीं।
हालांकि, मध्यकाल के पुरुषवादी समाज ने नारी को कुंठित मर्यादाओं के नाम पर चार-दीवारी में कैद कर रखने में कोई कसर नहीं छोडी, परन्तु तब भी महिलाओं ने माता जीजाबाई और रानी दुर्गावती की तरह न केवल शास्त्रों से, अपितु शस्त्रों का वरण कर राष्ट्र की एकता और संप्रभुता की रक्षा की। वर्तमान में केवल भारतीय वायुसेना ही लड़ाकू पायलट के रूप में महिलाओं को लड़ाकू भूमिका में शामिल करती है। वायुसेना में 13.09% महिला अधिकारी हैं, जो तीनों सेनाओं में सबसे अधिक हैं। आर्मी में 3.80% महिला अधिकारी हैं, जबकि नौसेना में 6% महिला अधिकारी हैं।

 परन्तु अपने विशिष्ट शारीरिक विन्यास के कारण पुरुषों से आमतौर पर कमजोर समझी जाने वाली महिलाओं को ‘प्रतिरक्षा सेवाओं’ में इतनी आसानी से स्वीकृत नहीं किया गया। भारत में 1992 में केवल पांच वर्षों की अवधि के लिए महिला अधिकारियों की भर्ती  शुरू हुई, अंत में इसे बढ़ाकर 10 और बाद के अवधि में 14 वर्ष कर दिया गया। 2016 में तीन महिलाओं को फायटर पायलट के रूप में तैनात किया गया था। इनकी नियुक्ति पायलट प्रोजेक्ट के रूप में की गई थी। शुरू में केवल चिकित्सा सेवाओं तक सीमित भूमिका में रही सैन्य अफसर महिलाओं को  2019 में सरकार ने उन सभी दस शाखाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का फैसला किया जहां उन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन  के लिए शामिल किया गया है - सिग्नल, इंजीनियर, आर्मी एविएशन, आर्मी एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर, आर्मी सर्विस कॉर्प्स, आर्मी ऑर्डिनेंस कोर और इंटेलिजेंस।

आज महिला अधिकारी भारतीय सशस्त्र बलों की गर्व और आवश्यक सदस्य हैं । अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ और मोहना सिंह अब भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रन का हिस्सा हैं। कहीं नेवी में पायलट और कहीं ऑब्जर्वर के तौर पर महिलाएं समुद्री टोही विमान में सवार हैं, तो कहीं आसमान से लड़ाकू की भूमिका में  है।भारत  सरकार सेना में "स्त्री  शक्ति" (महिला शक्ति) को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

हालाँकि, महिला अधिकारियों को उनके पुरुष सहयोगियों के साथ लाने में चुनौतियाँ हैं
महिला अधिकारियों को अब लड़ाकू जेट के पायलट और युद्धपोतों पर तो तैनात किया जाता है, लेकिन सेना में महिला अधिकारियों को सेना के पैदल सेना और बख्तरबंद डिवीजनों में, दुश्मन और यातना द्वारा पकड़े जाने के डर से शामिल नहीं किया जाता है।अमेरिका अपने महिला सैनिकों को युद्ध के मोर्चे पर भेजता है और वे वहां मारी भी जाती हैं और युद्धबंदी भी बनाई जाती हैं. इससे न तो देश की, न ही अमेरिकी औरतों की इज्जत खराब होती है.

 सोचने की बात यह है की जब अमेरीकी फ़ौज की महिलाएं इराक़ और अफग़ानिस्तान में लड़ सकती हैं, तो भारतीय महिलाएँ क्यों नहीं? अगर पैरामिलिट्री फोर्सेज व पुलिस में महिलाओं की भागेदारी हो सकती है, तो सेना में क्यों नहीं? भारत में महिलाओं को मोर्चे पर न भेजने का एक बड़ा तर्क ये होता है कि अगर दुश्मन देश में भारतीय महिला सैनिकों को बंदी बना लिया तो क्या होगा? एक भ्रान्ति ये भी कि पुरुष सैनिक, जो मुख्यतः ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं, एक महिला कमांडर को "स्वीकार" करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।

महिला अधिकारियों के शरीर विज्ञान, मातृत्व और शारीरिक विशेषताओं पर चिंताएँ उठाई जाती हैं। महिला अधिकारियों और उनके पुरुषों के समकक्षों के लिए सेवा की शर्तों में अंतर उनके पक्ष में माना जाता है।महिला अधिकारियों को भर्ती के दौरान शारीरिक दक्षता परीक्षण मानकों में रियायतें हैं। महिला अधिकारी नियुक्तियों में  स्वच्छता, संवेदनशीलता और गोपनीयता के मुद्दों पर अतिरिक्त विचार करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए पहले सामाजिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता होगी.

दुनिया और भारत के इतिहास में महिला योद्धाओं का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है . जॉन ऑफ आर्क से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, चित्तूर की रानी चेनम्मा, चांद बीवी, गोंड रानी दुर्गावती, झलकारी बाई, उदादेवी पासी जैसी योद्धाओं ने अपना नाम  पुरुष योद्धाओं से भी बढ़कर कमाया है. इनके साथ कभी ये सवाल नहीं आया कि वे युद्ध क्षेत्र में कपड़े कैसे बदलती थीं या कि वे योद्धा होने के दौरान गर्भवती हो जातींतो क्या होता ?  आखिर ऐसा क्या है कि जो बात पहले हो सकती थी, वह आज नहीं हो पा रही है? कहीं हमारी घटिया मानसिकता तो महिलाओंकी भूमिका को कमजोर करने पर नहीं तुली??

भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका को कैसे बढ़ाया जा सकता है इस पर  अध्ययन किये जाने संतुलित सोचने की की ज़रूरत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाएँ सेना में बहुत से कार्य बेहतर ढंग से कर रही हैं लेकिन हमें यह भी देखने की ज़रूरत है कि इनके कार्यक्षेत्र को किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है। महिला अधिकारियों को दी जाने वाली कुछ रियायतें वापस ली जा सकती हैं, कमांड के लिए चयन अधिकारी की गोपनीय रिपोर्टों और बंद पदोन्नति बोर्ड के माध्यम से किया जाना चाहिए, दोनों लिंगों के लिए सामान्य, और प्रोफ़ाइल के नाम और लिंग चयन बोर्ड से छिपाए जाने चाहिए। जेंडर इक्वेलिटी ’समय की सामाजिक जरूरत है और यह महिला और पुरुष दोनों अधिकारियों पर लागू होता है और सशस्त्र बलों की  प्रभावशीलता से समझौता किए बिना संतुलित निर्णय की भावना से इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए। महिलाओं की भागीदारी सेना को और ज़्यादा प्रभावी बना सकती है.

आज महिलाएँ पूरी दुनिया में सैन्य क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।  अगर कोई महिला अपनी मर्जी से, तमाम जोखिम को जानकर, सेना में आती है, तो किसी को भी उसका पिता बनकर उसके लिए फैसला करने का अधिकार नहीं है. अगर महिलाएं तमाम जोखिम को समझकर और तमाम दिक्कतों का सामना करने के लिए तैयार होकर सेना में शामिल होती हैं, तो सेना में हर तरह की भूमिकाएं उनके लिए खोल देनी चाहिए. फ़ौज और मिलिट्री एक एकीकृत संस्था के रूप में काम करती है और महिलाओं व पुरुषों के साथ काम करने से राह आसान ही होगी. जब जवान के स्तर पर महिलाएँ शामिल होंगी तभी पुरुष जवानों का महिला अफ़सर पर विश्वास मज़बूत होगा और सेना सशक्त हो कर उभरेगी.

-- ----प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
    

सबका ध्यान रखने वाले कोरोना योद्धाओं का हम ध्यान रखें


(इन वीरों  के मान-सम्मान को बरकरार रखना चाहिए, ये देश की सरकार और न्यायालय की अहम जिम्मेदारी बनती है)
 
 ---प्रियंका सौरभ   
कोरोना महामारी ने पूरी विश्व व्यवस्था को बदल दिया है और लगभग सभी को अपने जीवन के तरीके को बदलने के लिए मजबूर भी किया है। हालांकि, कई लोगों के लिए इस महामारी ने न केवल अपने व्यावसायिक दृष्टिकोण को बदलने के लिए मजबूर किया, बल्कि इसने उनके काम की मात्रा में वृद्धि की; काम के घंटे बढ़ने, नौकरी संभालने के जोखिम, तनाव की मात्रा में वृद्धि आदि भी नए विषय उभर का सामने आये .मगर इस  महामारी के दौरान लोक सेवक और स्वास्थ्य पेशेवर अधिक जोखिम में रहें हैं। जब सारी दुनिया अपने घरों में महफूज जीवन जी रही थी, तब इन योद्धाओं ने अपना जीवन दांव पर लगाकर सबकी सहायता करने में कोई कमी/कसर नहीं छोड़ी, जैसे ही काम के बोझ में वृद्धि हुई, समाज के कुछ वर्गों ने इन कोरोना वारियर्स को अतिरिक्त वेतन देकर उन्हें क्षतिपूर्ति देने का तर्क दिया, जबकि कुछ ने इसका विरोध भी किया।



वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को चपेट में ले रखा है। आज भी दुनिया भर में इस वायरस से संक्रमित होने वालों और जान गंवाने वालों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। भारत समेत तमाम देशों में अब कोरोना के मरीज बढ़ रहें हैं। वहीं कोरोना के फ्रंट लाइन वारियर्स हर दिन अपनी जान हथेली पर रख इस वायरस से लड़ रहे हैं। कुछ ने तो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस युद्ध में जान तक न्योछावर कर दी है.अपने स्वयं के जीवन और उनके परिवारों के जीवन को खतरे में डालते हुए, लोक सेवक फ्रंटलाइन पेशेवर बने जो कोरोना को फैलने से रोकने और बेअसर करने के लिए  पहले दिन से कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वे वे हैं जो अभूतपूर्व स्थिति से निपट रहे हैं, और इस खतरे से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे हैं।

 हमने देखा है कि उनके काम के घंटे बढ़े हैं,अत्यधिक काम करने वाले लोक सेवकों को भारी मात्रा में तनाव का सामना करना पड़ रहा है और कभी-कभी समाज में गलत सूचना के प्रसार के कारण उन्हें सार्वजनिक क्रोध का भी सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में पुलिस कर्मियों और स्वास्थ्य अधिकारियों को एक गांव में चेक अप अभियान के लिए जाने पर पथराव की स्थिति का सामना करना पड़ा। साथ ही वे ढांचागत समस्याओं की कमी से भी जूझ रहे हैं और नवीन समाधानों के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। जैसे कुछ जिलों में लोक सेवकों ने नए विचारों के साथ नागरिकों के दैनिक जीवन को वापस लाने की योजना बनाई है, जैसे कि बाजार शुरू करने के लिए विषम योजनाएं, अभिनव विज्ञापन बनाना, गीतों और कविताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक करना आदि।

 देश भर से अब ऐसी ख़बरें नहीं आई है कि एक तरफ तो कोरोना योद्धाओं पर फूल बरसाकर उनके प्रति सम्मान जताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर संक्रमित होने पर उन्हें इलाज के लिए भटकने को छोड़ दिया गया है। देश की लगभग सभी  राज्य सरकार ने कोरोना योद्धाओं की मौत पर तो उनके परिवार की आर्थिक मदद के लिए 50 लाख रुपए का प्रावधान कर दिया, मगर  संक्रमित होने पर अस्पताल में लगने वाले खर्च को लेकर सचेत नहीं है। हालत यह हो गए है  कि डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, पुलिस अधिकारी तक को इलाज के रुपयों के लिए साथियों व रिश्तेदारों से गुहार लगानी पड़ रही है। केंद्र सरकार को ऐसे मामलों पर सख्ती से पेश आकर इन वीरों  के मान-सम्मान को बरकरार रखना चाहिए, ये देश की सरकार और न्यायालय की अहम जिम्मेदारी बनती है.

किसी भी कार्य को पूरा करने और आगे बढ़ने के लिए अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। जिसे ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी और राज्य के स्वास्थ्य सचिव निकुंज धाल द्वारा दिखाए गए अनुकरणीय सेवा से देखा जा सकता है, जो अपने पिता की मृत्यु के 24 घंटे के भीतर ड्यूटी पर लौट आए। यह कर्तव्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर जोर देता है। हम उनकी इस देश सेवा की निष्ठा के आगे नतमस्तक है ,देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वर्तमान में अलगाव का अभ्यास कर रहा है और घर से काम कर रहा है, या बिल्कुल भी काम नहीं कर रहा है। ऐसे समय के दौरान, आईएएस अधिकारी और ग्रेटर विशाखापत्तनम नगर निगम के आयुक्त (जीवीएमसी) जी श्रीजाना, बच्चे को जन्म देने के 22 दिन बाद ही काम पर लौट आईं, जिससे उनकी प्रसूति टूट गई। आईएएस अधिकारी जी श्रीजाना द्वारा समर्पण का यह कार्य इतनी बड़ी जिम्मेदारी को संभालने के महत्व को दिखाकर एक सबक देता है।

 ऐसी खबरें भी सुर्खियां बनीं कि कोरोना से मौत के बाद बेटे ने पिता के शव को कंधा नहीं दिया, मां के शव को कंधा नहीं दिया, परिवार वाले शव छोड़कर चले गए। इन्हीं खबरों के बीच कश्मीर के श्रीनगर निवासी एंबुलेंस चालक जमील अहमद डिगू ऐसे कोरोना वारियर्स के रूप में सामने आए हैं, जिन्होंने श्रीनगर में कोरोना से मरने वाले सभी मरीजों के शव को न सिर्फ कब्रिस्तान तक पहुंचाया बल्कि उन्हें दफन करने में भी मदद की। वह पिछले चार महीने से अपनी जान की परवाह किए बिना मानवता की सेवा में लगे हुए हैं।कई लोक सेवक दर्दनाक तनाव के बाद मनोवैज्ञानिक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं और अपने पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना का जोखिम उठा रहें है। अपना कर्तव्य निभाते हुए अनुकरणीय साहस भी दिखा रहे हैं। उनके साहसी कार्य के बावजूद, कुछ समाज तबके उनको वो सम्मान नहीं दे रहें जो उनको मिलना चाहिए.

हमारे लोक सेवक इस तरह की गंभीर स्थिति को संभाल रहे हैं, इसलिए वे वास्तव में कोविद -19 के दौरान अपने अतिरिक्त घंटों के काम के लिए अतिरिक्त भुगतान करने के लायक हैं। इस पर हमें बेवजह की बहस में नहीं पड़ना चाहिए। हाल ही में, महाराष्ट्र की एक स्कूल जाने वाली लड़की ने अपनी सेवा के लिए पुलिस कर्मियों की सराहना करते हुए एक पत्र लिखा है। कृतज्ञता के इस छोटे से कार्य ने पुलिस कर्मियों के मनोबल को बढ़ाने में मदद की है। इस तरह के छोटे -छोटे कार्य  न केवल उन्हें बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद करेगा, बल्कि इस कोविद -19 महामारी को भी जल्द से जल्द समाप्त करने में मदद करेगा। 
-- ----प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

आयुर्वेद को दवा माफियाओं से बचाना होगा।

(आयुर्वेद के नाम पर झूठे दावों, दवाइयों के जालसाजी आदि के लिए भारी जुर्माना का प्रावधान करना अत्यंत जरूरी है।)

  ----प्रियंका सौरभ   

आयुर्वेद में प्राकृतिक उपचार की हजारों वर्षों की परंपरा का मिश्रण है। आयुर्वेदिक चिकित्सा यानी घरेलू उपचार दुनिया की सबसे पुराना चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। आयुर्वेदिक तरीका रोगी को चंगा करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है, प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार की तुलना में स्वास्थ्यवर्धन पर अधिक महत्व दिया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की एक कला विज्ञान है। कोविद-19 महामारी के दौरान प्राकृतिक उपचार का ज्ञान पूरे विश्व में लाइमलाइट में आया है।



इसलिए विशेष रूप से विश्व बाजार में प्राकृतिक उपचार की मांग को पूरा करने के लिए आयुर्वेद को अच्छे तरीके से दुनिया के सामने रखने और सही जानकारी से पूर्ण करने की आवश्यकता है, प्राकृतिक चिकित्सा में कृत्रिम औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में विषैली औषधियों को शरीर के लिये अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है। प्रकृति चिकित्सक है दवा नहीं।

औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्त के काम में लगाई जाती है। इस लिये प्राकृतिक चिकित्सा में सप्राण खाद्य सामग्री ही औषधि हैं। बदलते हालत में फ़र्ज़ी कम्पनिया आज आयुर्वेद के नाम पर अपना कूड़ा-कर्कट लेकर बाज़ार में उतर गई है, जो आयुर्वेद के इतिहास को बदनाम कर रहे हैं, हमें इन सबसे बचने के जल्दी ही नए तरिके ढूंढने होंगे ताकि भारत की ये प्राचीन शिक्षा पद्धति अपने वर्चस्व को बनाये रखे।

आधुनिक सोच वैकल्पिक चिकित्सा खोज रही है।  और यह अच्छा है, भारत पारंपरिक हर्बल दवाओं के निर्माता और निर्यातक के रूप में बहुत कुछ हासिल करने के लिए दुनिया की पहली पसंद के तौर पर खड़ा है। प्राकृतिक उपचार, पारंपरिक और वैकल्पिक दवाओं और जड़ी बूटियों के साथ दुनिया का बढ़ता आकर्षण भारत के लिए अच्छा है। अब ये देश भर के किसानों और कंपनियों के लिए आय का एक बड़ा स्रोत प्रदान बन सकते हैं।

भारत में उत्पादित हर्बल दवाओं की बहुत कम मात्रा में निर्यात किया जाता है, क्योंकि वे आयात करने वाले देशों द्वारा आवश्यक नियामक मानकों को पूरा नहीं करते हैं। फिर भी अपने मौजूदा स्तर पर, थोड़ा निर्यात के साथ, अनुमान है कि आयुर्वेद भारत में 30,000 करोड़ रुपये का उद्योग है। हाल के कोरोनिल ’विवाद ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को आयुर्वेद के उपयोग को प्रोत्साहित करने में भूमिका निभानी होगी।

आयुर्वेद भारत के लिए आय और निर्यात का एक बड़ा स्रोत हैं, हमें सफल होने के लिए एक आधुनिक नियामक प्रणाली की आवश्यकता होगी। आयुर्वेदिक  दवाओं को बढ़ावा देने के लिए  सुरक्षा सुनिश्चित करना और  इन दवाओं की प्रभावकारिता के बारे में दावों की सच्चाई की जाँच करना अहम कार्य है। अन्यथा आयुर्वेदिक दवाएं स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती हैं। ये  खतरे मुख्य रूप से कई कारणों से उत्पन्न होते हैं, जैसे कि सभी पौधे खपत के लिए सुरक्षित नहीं हैं, राख और गैर-पौधे सामग्री का उपयोग, एलोपैथिक दवाओं का इलीगल प्रयोग वगैरह।

कुछ फ़र्ज़ी कम्पनिया आयुर्वेदिक दवा निर्माण में खतरनाक धातुओं को गैर कानूनी प्रयोग करती  है। हाल ही में, अमेरिका के खाद्य और औषधि प्रशासन ने कुछ आयुर्वेदिक दवाओं के उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी थी क्योंकि उन्होंने आयुर्वेद के नाम पर एक दवा को लेड के खतरनाक स्तर से युक्त पाया।

ये सब बेईमान दवा निर्माता करते हैं। ये आयुर्वेदिक दवाओं में आमतौर पर स्टेरॉयड दवाओं को मिलाते हैं। कुछ स्टेरॉयड (ज्यादातर कॉर्टिकोस्टेरॉइड) परिसंचरण और सतर्कता में सुधार करके रोग कल्याण की झूठी भावना देते हैं।

ऐसी दवाएं संक्रमण की तरह है, वे अंतर्निहित बीमारी को तेज कर सकते हैं, लेकिन रोगी आयुर्वेद के नाम पर स्टेरॉयड लेता है, वह बेहतर महसूस करता है और इसे दवा के रूप में अपनाता है। मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल के एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 40% आयुर्वेदिक दवाओं में स्टेरॉयड शामिल हैं।

जहरीले पौधों का अनियंत्रित उपयोग, भारी धातुओं की उपस्थिति, और एकमुश्त धोखाधड़ी (स्टेरॉयड जोड़ना) भारतीय चिकित्सा की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है। बेईमान और लापरवाह निर्माता धोखा देकर मुनाफा कमाते हैं, लेकिन वास्तव में वो पूरे आयुर्वेद जगत  की स्थिति को नुकसान पहुंचाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में समस्या और भी ज्यादा बदतर है। प्रयास करने के बाद हम भारत में स्थापित ब्रांडों और संदिग्ध लोगों के बीच अंतर करने में सक्षम हो सकते हैं, मगर यह विदेश में बहुत मुश्किल है।

  आज आयुर्वेद  के नियमन ,सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक हो गया है।  अन्यथा भविष्य में आयुर्वेद खत्म हो जायेगा, हमें ये कोशिश  करनी होगी कि आयुर्वेद के नाम पर लोग कचरा न बेचें। इसके लिए सुरक्षा प्रावधानों को लागू कर चिकित्सीय दावों की जाँच करना जरूरी  है। आयुर्वेद के नाम पर झूठे दावों, दवाइयों के जालसाजी आदि के लिए भारी जुर्माना का प्रावधान करना अत्यंत जरूरी है।

वैसे 2003 में, भारत सरकार ने आयुर्वेदिक दवाओं की पहली आधिकारिक सूची प्रकाशित की, जिसे फार्माकोपिया कहा जाता है। किसी फार्माकोपिया का प्रकाशन किसी भी चिकित्सा प्रणाली को औपचारिक बनाने की दिशा में पहला कदम है। 2014 में, सरकार ने आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (सामूहिक रूप से आयुष कहा जाता है) के विनियमन को एक अलग नामकरण मंत्रालय में मिला दिया। 2017 में, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना दिल्ली में प्रसिद्ध अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की तर्ज पर की गई थी। इसके अलावा हाल ही में, सरकार ने जन औषधि दुकानों में आयुर्वेदिक दवाओं को बेचने का फैसला किया है।

 कोरोना के इस दौर में प्राकृतिक उपचारों, पारंपरिक तथा वैकल्पिक दवाओं एवं जड़ी-बूटियों की ओर झुकाव दुनिया भर में बढ़ता ही जा रहा है. यह झुकाव  भारत के लिए एक अच्छा संकेत है. अगर ये मांग बढ़ती है तो ये दवाएं देशभर में किसानों और कंपनियों के लिए अच्छी आमदनी का स्रोत बन सकती हैं,

अगर आयुष और जड़ी-बूटियों की खेती को बढ़ावा,प्रचार,प्रसार करने के साथ अगर हम आयुर्वेदिक दवाओं के लिए एक कानूनी  व्यवस्था बनाते हैं तो इस कदम से न केवल रोगियों की सुरक्षा होगी बल्कि आयुर्वेद को उपचार की एक सुरक्षित,जवाबदेही तथा कारगर व्यवस्था के रूप में भविष्य कि सबसे मजबूत और प्रभावी पद्धति के रूप में देख पाएंगे, बदलते दौर में ये  एक ऐसी प्रणाली जिसमें भारत एक विश्व  नेता हो सकता है।

-- ----प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

‘दिव्यांगों को अनुसूचित जाति-जनजाति के समान आरक्षण’


(इस फैसले से दिव्यांगों की सामाजिक स्थिति को मजबूती मिलेगी, शिक्षा या रोजगार के लिए खुलेंगे नए रास्ते )

----प्रियंका सौरभ 

हमारे भारत का संविधान हम सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय व गरिमा का रक्षक है और यह  दिव्यांग को समाज में समानता  पर जोर डालता है। वर्तमान  वर्षों में विकलांगों के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदला है। सही भी है अगर विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

भारत की जनगणना 2001 के मुताबिक, देश में 2.19 करोड़ व्यक्ति विकलांगता के साथ जीवन यापन कर रहें है, जो कुल जनसंख्या का 2.13% हिस्सा है। इनमे से 75% विकलांग व्यक्ति ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, तथा 49% विकलांग व्यक्ति साक्षर हैं व 34% रोजगार प्राप्त हैं। हाल ही में  विकलांगता से पीड़ित लोग समान लाभ और आराम के हकदार हैं इसलिए  उनकी सामाजिक स्थिति को मजबूती और शिक्षा या रोजगार के लिए इनको अनुसूचित जाति में बराबर लाभ का अधिकारी बनाया है




हमारे राज्य नीति (डीपीएसपी) के निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता की सीमा के भीतर, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामलों में काम करने, शिक्षा के अधिकार और सार्वजनिक सहायता के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा।  विकलांगों और बेरोजगारों की  राहत का विषय ’संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में निर्दिष्ट है।

इससे पूर्व  दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2012 में  फैसला किया था कि “विकलांग लोग सामाजिक रूप से भी पिछड़े हैं, और इसलिए, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति को दिए गए समान लाभ के हकदार हैं। देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में जब अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को प्रवेश के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए कुछ निश्चित अंकों की छूट मिलती है, तो वही छूट विकलांग उम्मीदवारों पर भी अब  लागू होगी।

उच्च न्यायालय के समक्ष 2012 के मामले में ये फैसला तब आया जब  एक विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम पात्रता आवश्यकता में 10% रियायत और विकलांग आवेदकों के लिए 5% रियायत की अनुमति दी थी। उच्च न्यायालय ने इसे भेदभावपूर्ण करार देते हुए  फैसला सुनाया।

वैसे भी  विकलांग लोगों को उचित शिक्षा प्रदान किए बिना, "संविधान के तहत और उसके बाद 1995 के कानून में विकलांगों को समान अवसर प्रदान करने और उनके अधिकारों की रक्षा करने" पर उनके अधिकारों का कोई सार्थक प्रवर्तन नहीं हो सकता है। यह संघ का कर्तव्य बनता है, राज्यों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेशों को भी  ये मामला उठाना चाहिए।

अब विकलांगों के प्रकार को 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया गया है। इस अधिनियम में मानसिक बीमारी, आत्मकेंद्रित, स्पेक्ट्रम विकार, सेरेब्रल पाल्सी, मांसपेशियों की डिस्ट्रोफी, पुरानी न्यूरोलॉजिकल स्थितियां, भाषण और भाषा की विकलांगता, थैलेसीमिया, हेमिलीलिया, सिकल सेल रोग, बहरे सहित कई विकलांगता शामिल हैं। अंधापन, एसिड अटैक पीड़ित और पार्किंसंस रोग जिसे पहले के अधिनियम में बड़े पैमाने पर अनदेखा किया गया था। इसके अलावा, सरकार को किसी अन्य श्रेणी को निर्दिष्ट विकलांगता को सूचित करने के लिए अधिकृत किया गया है।

यह सरकारी नौकरियों में 3% से 4% और उच्च शिक्षा संस्थानों में 3% से 5% तक विकलांग लोगों के लिए आरक्षण की पैरवी करता है। 6 और 18 वर्ष की आयु के बीच बेंचमार्क विकलांगता वाले प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा का अधिकार होगा। सरकारी वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थानों को समावेशी शिक्षा प्रदान करनी होगी।

एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन के साथ निर्धारित समय सीमा में सार्वजनिक भवनों में पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जोर दिया गया है। विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त विनियामक निकायों और शिकायत निवारण एजेंसियों, अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी के रूप में कार्य करेंगे। विकलांग व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए एक अलग राष्ट्रीय और राज्य कोष बनाया जाएगा।

भारत में विकलांगों के लिए सुलभ भारत अयान भिसंजीवनी बनकर उभरा है, ये अभियान विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर के लिए पहुँच प्राप्त करने और स्वतंत्र रूप से  जीवन के सभी पहलुओं में पूरी तरह से भाग लेने में सक्षम करेगा। ये अभियान विकलांगो के लिए उचित वातावरण , परिवहन प्रणाली और सूचना और संचार पारिस्थितिकी तंत्र की पहुंच बढ़ाने पर लक्षित है।

कई लोग सोचते हैं कि आरक्षित श्रेणियों के तहत चुने गए व्यक्ति, विशेष रूप से अलग-अलग एबल्ड श्रेणी के तहत, मेधावी उम्मीदवार नहीं हैं और उनका चयन उन संस्थानों की गुणवत्ता में कमी लाता है, जिनमें उनका चयन किया जाता है। यदि यह मानसिकता बनी रहती है, तो हमें उम्मीद करनी चाहिए कि विकलांगता आरक्षण का प्रणालीगत उल्लंघन जारी रहेगा। 2016 के कानून ने विकलांगों के लिए कोटा को 3% से बढ़ाकर 5%  करने की मांग की और निजी क्षेत्र के लिए भी उन्हें नियुक्त करने के लिए परिकल्पना की। आज सबसे ज्यादा और देश हित में  यह महत्वपूर्ण है कि आबादी के इस महत्वपूर्ण खंड को सामाजिक और आर्थिक उन्नति से न छोड़ा जाए।

हमारा विचार है कि उच्च न्यायालय इस  पहलू पर सही है।  उच्च न्यायालय ने सही ढंग से माना है कि दिव्यांग लोग भी सामाजिक रूप से पिछड़े हैं, और इसलिए, कम से कम,वो अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के समान लाभ के हकदार हैं। इसके साथ-साथ हर पांच साल में राष्ट्रीय नीति के  तहत विकलांगो की सुविधाओं की समीक्षा की जनि चाहिए। एक  क्रियान्वयन दस्तावेज  तैयार किया जाये तथा पांच सालों के लिए एक रोडमैप का निर्माण किया जाए, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में संपन्न किया जाए। राज्य नीति तथा कार्य योजना के लिए राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों से विकलांगो हेतु स्पेशल नीति पर सरकार विशेष प्रोत्साहन को बढ़ावा दे।
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----प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

पूरी पढ़ाई अभिभावक करवाए और फीस वसूले स्कूल 

( तरह-तरह की तिकड़मबाजी से अभिभावकों को लूट रहें प्राइवेट स्कूल )
 
---प्रियंका सौरभ 
देश भर में ऑनलाइन क्लासेस के नाम पर  दिनों निजी स्कूलों में फीस वसूली का खेल धड़ल्ले से जारी है।  यही नहीं वो इन सबके के लिए खुलेआम अपनी आवाज़ बुलंद कर रहें है, इसी बीच इस बात को लेकर स्कूल प्रशासन और अभिभावकों के बीच तनातनी के बहुत से मामले सामने आये है। फीस वसूलने के लिए निजी स्कूल अभिभावकों को लगातार मैसेज और फोन कर रहे हैं। यही नहीं फीस जमा करने के लिए अभिभावकों को छूट का ऑफर भी दिया जा रहा है। कई स्कूलों में तो अप्रैल महीने का भी फीस भी उगाही जा रही है, जबकि अप्रैल महीने में न तो ऑनलाइन क्लासेस लगी और न ही स्कूल खुले थे।



 देश भर के प्राइवेट स्कूल ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर अभिभावकों से अप्रेल, मई और जून की बढ़ी हुई फीस वसूली कर रहे हैं। साथ ही स्कूली शिक्षकों को वेतन न देना पड़े, इसके लिए तरह-तरह की तिकड़मबाजी भी कर रहे हैं। इन सब समस्याओं को लेकर राज्यों के शिक्षा विभाग भी अनजान नहीं हैं, लेकिन वो कर कुछ नहीं पा रहे या फिर करना करना नहीं चाहते है। क्या ये शिक्षा का बाजीकरण कर माफिया तरह की हरकत नहीं है।  तभी तो उलटा हो गया है क्योंकि होमवर्क ही नहीं, क्लासवर्क भी पेरेंट को करवाना पड़ रहा है। ऑनलाइन क्लास में टीचर्स इतने छोटे बच्चे को पढ़ाने में सक्षम नहीं है और वह बच्चे की बजाय बच्चे के पेरेंट्स को ही कहते हैं कि इसे एल्फाबेट और नंबर लिखना सिखाएं।

यही  नहीं  खर्चे भी दोहरे हो गए है इस वजह से पेरेंट्स को अलग से स्मार्ट फोन का प्रबंध करना पड़ रहा है ,जो ऑनलाइन क्लास के दौरान बच्चे के लिए उपलब्ध रहे और दोनों में से एक पेरेंट्स को घर भी रहना पड़ता है क्योंकि छोटा बच्चा खुद मोबाइल ऑपरेट नहीं कर सकता है आज देश भर के अभिभावक मजबूर है। छात्र परेशान हैं। पर वो जायें तो कहां जाये ? कोचिंग सेंटरों  और प्राइवेट स्कूलों की  इस प्रकार की लूट पर सरकार का भी नियंत्रण नहीं है ।  शिक्षा विभाग भी चुप है।  क्या नजीर है ये भी?  घर में पूरी पढाई अभिवावक करवायेंगे और फीस स्कूल लेंगे।  क्या अभिभावकों को अब फीस माफ़ी के बजाय अपनी मेहनत के लिए स्कूलों से उलटी उनको फीस अदायगी की बात नहीं रखनी चाहिए।  इस बात की मीडिया भी वकालत क्यों नहीं कर रहा है ?

प्राइवेट स्कूलों का तर्क है कि उनके खर्चे पूरे कैसे हो।  ये बात ज्यादा जमने वाली नहीं है।  पहली बात तो आजकल स्कूल बंद है  तो  उनके बिजली, पानी , साफ़-सफाई और ट्रांसपोर्ट के सभी खर्चे शून्य हो चुके है।  जहां तक शिक्षकों के वेतन की बात है तो सभी को पता है कि पहले से ही र्पाइवेट स्कूल घपले करते रहे हैं। ये शिक्षकों से 30 हजार पर साइन करा के 14 हजार देते रहे हैं लेकिन इस लॉकडाउन में शिक्षकों को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा रहा है या फिर उनसे ऑनलाइन क्लासेज पढ़वाने के बावजूद कई महीनों से वेतन नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में ये भी सवाल है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है?

वहीं अगर स्कूल पक्ष की बात करें तो स्कूलों की ओर से कहा जा रहा है कि उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिलती सिर्फ फीस से ही शिक्षकों-स्टाफ को वेतन दिया जाता है। तो सालों की कमाई आखिर कहाँ गायब हो गई।  एक बच्चे से ये साल बाहर तीस से चालीस हज़ार तो कम से कम लेते हैं।  फिर कहाँ गायब हो गए इनके करोडो रुपए ??   ऐसे में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से भी आदेश दिया गया है कि सभी र्पाइवेट स्कूल अपने अकाउंट का ब्यौरा सार्वजनिक करें। और पता किया जाए कि ये स्कूल अपने खर्चों को घटाने के बावजूद भी भारी मुनाफा कमा रहें है।  सभी स्कूल अपनी बैलेंस शीट और आय-व्यय का विवरण अपने स्कूल कि वेबसाइट पर लगाए और सम्बंधित जिला शिक्षा अधिकारी से वेरीफाई करवाए। प्राइवेट स्कूलों के धंधे बड़े काले है, बीस रुपए की सरकारी पुस्तक लगाने की बजाये ये अपने पब्लिशर से उसी पुस्तक के पांच सौ से छह सौ रुपए वसूलते आये है।  आखिर ये खुली लूट की छूट इनको मिलती कैसे है, सोचना होगा और अभिभावकों को इस बारे आंदोलन पर उतरना होगा।

फीस वसूली बारे दक्षिण भारत में कनार्टक सरकार ने राज्य के प्राइवेट स्कूलों को चेतावनी दी है कि यदि कोई भी प्राइवेट स्कूल ऑनलाइन दाखिला या ऑनलाइन क्लॉस लेने के नाम पर फीस लेगा तो उसके खिलाफ महामारी रोग अधिनियम 1897 की धारा -3 के तहत कार्रवाई की जाएगी। सार्वजनिक निर्देश विभाग ने स्कूल प्रबंधन को चेतावनी दी है कि यदि कोई शैक्षणिक संस्थान कानून का उल्लंघन करता हैं, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई  भी की जाएगी। ऐसे कानून सभी राज्यों और केंद्र सरकार को तुरंत अमल में लाने चाहिए।

लेकिन इनके लिए सबसे पहले, यह मानना आवश्यक है कि स्कूलों का नियंत्रण राज्य सरकारों का विषय है। इसलिए राज्य सरकारों को निजी पहल को रोकना नहीं चाहिए।  स्कूलों की शोषणकारी प्रथाओं से जनता की रक्षा करना होना चाहिए। राज्यों को एक स्वतंत्र, अर्ध-न्यायिक विद्यालय नियामक संस्था का गठन करना चाहिए। आज, शिक्षा विवादित हैं क्योंकि बड़े-बड़े राजनेता और उनके रिश्तेदार इन स्कूलों के सबसे बड़े संचालक भी हैं। राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप से ही इस लूट से बचा जा सकता है।
 
कानून के अनुसार ऐसा हो कि स्कूल लाभ के लिए न हों बल्कि समाज सेवा के अंतर्गत हो। और इसे प्रमाणित करने के लिए, कंपनियों के समान ही वार्षिक वित्तीय लेखा परीक्षाओं को उसी कठोरता के साथ निष्पादित किया जाना चाहिए। स्कूलों के लिए लेखांकन मानकों को विकसित करने की आवश्यकता है, जो कि ऐसी नॉन-फॉर-प्रॉफिट एंटिटीज़ से पैसे निकालने के लिए अक्सर इस्तेमाल की जाने वाली प्रथाओं को खत्म करने के उद्देश्य से किया जाता है।

स्कूलों को हर साल सार्वजनिक रूप से अपनी फीस प्रकाशित करनी चाहिए, और उसके बाद किसी भी बदलाव की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ऐसा कोई भी प्रयास अधिक भ्रष्टाचार के लिए जगह प्रदान करेगा। फीस की स्थिरता, अन्य वित्तीय मामलों और सुरक्षा पर माता-पिता के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध कराया जाना चाहिए। समतामूलक शिक्षा तक पहुंच के खिलाफ कुछ भी हो, उसे राष्ट्रीय कुरीति माना जाना चाहिए और इसे अत्यंत प्राथमिकता और महत्व के साथ ठीक किया जाना चाहिए।  अच्छी, न्यायसंगत शिक्षा के लिए एक मजबूत सार्वजनिक प्रणाली का कोई विकल्प नहीं है।

 ---प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
असली चेहरा तो नक़ाब में ही रह गया, सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी

( सोची समझी योजना सफल , भ्रष्ट राजनेता और पुलिस वाले बने नायक )
  
---प्रियंका सौरभ   
अंततः विकास दुबे कानपुर वाला कानपुर में पुलिस के हाथों मारा गया। वैसे भी हर अपराधी को उसके अपराध का उचित दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। लेकिन ये दंड देश में संविधान द्वारा स्थापित कानून व्यवस्था के तहत ही मिलना चाहिए। यदि वर्तमान कानून व्यवस्था में कोई त्रुटियां हैं तो उनमें सुधार करना चाहिए, कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को भी नहीं है।


आज विकास दुबे के विवादास्पद एनकाउंटर पर ये हज़ारों प्रश्न उठ खड़े हुए है, किसकी नाकामी है ये? अगर ऐसा ही चलता रहा और ऐसे एनकाउंटर्स को ठीक समझा जाने लगा तो, कहीं ऐसा ना हो कि लोग अपना-अपना न्याय अपने ही हाथों से सड़कों पर ना करनें लग जाएं।

गैंगस्टर विकास दुबे की गिरफ्तारी और उसके कुछ साथियों के एनकाउंटर पुलिस की कामयाबी नहीं है। बल्कि पुलिस और राजनीति का बहुत बड़ा गठजोड़ है, जिसको समझने लायक छोड़ा नहीं गया मगर ये पब्लिक है जनाब सब समझ लेती है। अपराधी पकड़े जाते हैं और छूट भी जाते हैं।

मगर ये घटनाक्रम  बताता है कि राजनीति में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो अपराधियों की मदद कर उनसे अपने आर्थिक और सियासी हित साधते हैं। और ये अपवित्र आपराधिक गंठजोड़  सामने आने से फिर बच गया।  दुबे के इस अंत से सबसे ज्यादा ख़ुश हैं सत्ताधारी और  विपक्षी दलों के असंख्य छोटे-बड़े नेता और जयचंद किस्म के पुलिसकर्मी जिन्हें दुबे के जीवित रहते उसके साथ अपने नापाक रिश्तों के किसी भी वक़्त बेनक़ाब होने की चिंता सता रही थी।

मगर क्या हम सब ये समझ नहीं पाए?  इस मुठभेड़ से दुबे के हाथों मारे गए सभी आठ पुलिसकर्मियों के स्वजनों-परिजनों को थोड़ी-बहुत शांति मिली होगी। मगर आम लोग बहुत दिनों तक समझ ही नहीं पाएंगे कि उत्तर प्रदेश में जो हो हुआ उससे उन्हें खुश होना चाहिए या चिंतित। बहुत से सवाल हर किसी के जहन में कुलबुला रहे है। जिस व्यक्ति ने स्वयं सरेंडर किया हो क्या वो पुलिसवालो के हथियार छीन कर भागेगा?

और दूसरी बात इतने अच्छे रास्ते पर स्कार्पियो जैसी गाड़ी कैसे पलटी? बाकी किसी का पता नहीं लेकिन उस ड्राइवर के टैलेंट को सलाम करना होगा जिसने अपराधी को मारने के लिए अपनी गाड़ी पलटा दी।  तीसरी बात मीडिया को क्यों रोका गया?  ऐसा भी तो हो सकता है कि वो मुजरिम को उतारकर पहले इनकाउंटर कर बाक़ी चार -पांच आदमी मिलकर गाड़ी को पलट दिये होंगे ताकी मीडिया और पब्लिक को दिखया जा सके।

जहां तक मैं सोचती  हूँ सच तो यह है विकास दुबे अगर बच जाता तो कई मंत्री, विधायक,सांसद व अधिकारी नपते !! वो खादी और वो ख़ाकी जो विकास दूबे के कुकर्मों में संलिप्त थे उन्हें इससे राहत मिली हैं। बाक़ी ये तो पब्लिक है सब जानती है और वक़्त आने पर अपना फैसला भी सुना देती है।

किसी लीपापोती से अब कुछ नहीं होगा।  कौन क्या कह रहा है इससे तथ्य छुप नहीं सकते। वह छ: दिनों तक किनके दिशा निर्देशन में  सफ़र तय करता रहा. कोटा होता हुआ, जैसा बताया जा रहा है, कैसे यूपी से उज्जैन पहुँचा ? पुलिस में क्या दो सौ ही उसकी मिजाज़पुर्सी में लगे थे, जिन्हें सर्विलांस पर लिया गया है या और धुरंधर भी इस कृत्य में शामिल हैं।

बिना कोर्ट के आदेश के विकास दुबे का घर तोड़ डाला गया। दुबे के सभी राज़दारों का एनकाउंटर हुआ। कोई ज़िंदा नहीं पकड़ा गया, एमपी से यूपी लाने में गाड़ी भी सिर्फ वो ही पलटी जिसमें विकास दुबे था। उसे हथकड़ी भी नहीं लगाई गई थी, गाड़ी के अंदर पुलिस की पिस्तौल भी छीनी,फिर उसने भागने की कोशिश की, और उसपर जो गोली चलाई गई, वो कमर से नीचे ना लगकर ऊपर ही लगी।

ये सत्य है कि कुछ सफ़ेद लोग काले होने से बच गये। सब स्क्रिपटिड था, वरना ना जाने कितने लोगों के नाम सामने आते और उनके कपड़े उतर जाते, ना उतरते तो जनता उतार देती। वैसे यह स्थिति सुखद नहीं है। इस तरह के इनकाउंटरस ये बताते हैं कि अपराधियों को अपनी औकात समझ लेना चाहिए, उनकी गुंडागर्दी के पेशे केवल प्रशासन के अधीन ही पनप सकते है। प्रशासनिक व राजनैतिक वरद हस्त हटा तो यही हाल होना है।

खैर फिलहाल तो खुश हूं। मैं 8 पुलिसकर्मियों को आज श्रद्धांजलि दे पा रही हूँ, न मैं नेता, न माफिया, न मैं खाकी, एक आम जनता हूँ और  पता नही क्यो खुश हूँ, इसके भी कारण होंगे जरूर कुछ न कुछ। मगर अब मेरा एक सवाल मुझसे ही सवाल कर रहा है, क्या इस  हिसाब से समाज का हित और न्याय अब पुलिस और सरकार को सौंपकर न्यायापालिका पर ताला लगा देना चाहिए। इससे गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा से जूझ रहे देश मे अरबो की बचत तो होगी।

ये सच है कि विकास दुबे के इनकॉउंटर से आप ख़ुश हो सकते है,उत्तर प्रदेश पुलिस प्रसन्न होगी कि इस मुठभेड़ द्वारा उसने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर हासिल कर ली है। योगी जी खुश होंगे कि एक मज़बूत और दुःसाहसी शासक के तौर पर उन्होंने अपनी छवि बना ली है।  लेकिन देश मे पिछले कुछ सालों से लोकतंत्र नही रहा और आने वाले समय मे ये बहुत ख़तरनाक होगा।

मेरी विकास दुबे से कोई हमदर्दी नही है पर इस तरीके को सही नही कह सकते हम। गांधी जी के हत्यारे गोडसे को भी उस समय भीड़ मार सकती थी, या जेल में ही उसकी हत्या कराई जा सकती थी पर भारत ने दुनिया को दिखाया कि वो लोकतांत्रिक देश है।जहाँ गाँधी की हत्या करने वाले को दंड भी न्यायायिक प्रकिया के तहत दिया जाता है।

 वर्तमान दौर में न्यायपालिका ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है औऱ हमारी मीडिया उलूल-फिजूल काम कर रही है, पुलिस का हाल ये हो गया है कि वो ख़ुद अब कोर्ट बन चुकी है। सड़क पर भीड़ फैसले करती है, इनकॉउंटर का महिमांडन होता है, गाली बकने वाले प्रवक्ताओं को हम सुनते है, अपराधी को हम नेता बनाते हैं। सबको पता है कि विकास दुबे की साठगांठ नेताओं से लेकर बड़े पुलिस अधिकारियो तक थी इसलिये उसका तो मरना ही था मगर वाकईं मरकर वो बहुतों को बेदाग कर गया।

-- ---प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

 Journalism running behind the news needs some red light. (What kind of journalism if the first news of any media institution does not bring...